प्रश्न यह की कौन हूं मैं? सब घट रहा है फिर भी मौन हूं मैं! श्वास श्वास घट रहा हूं, सूक्ष्म रूप रख रहा हूं। आधार मेरा सत्य है, असत्य में भी बस रहा हूं। यह देह मेरी मर्त्य है, अनन्त यह चेतनतत्तव है! मैं ही ब्रह्म हूं, मैं ही बिंदु हूं, तम भी मैं, उदगम भी मैं, विच्छेद मुझ से, संगम भी मैं। मैं सृष्टि हूं, नक्षत्र हूं, मृत्यु भी मैं, मैं ही जीवत्व हूं, आकाश में, पाताल में, भूलोक में, जलताल में, उपस्थिति मेरी यत्र तत्र है, मैं सर्वत्र हूं। प्रौढ़ मैं, यौवन भी मैं! मैं बाल हूं, मैं वृद्ध हूं| मैं योग हूं, मैं ही काम में, मैं प्रेम हूं, मैं ही क्रुद्ध हूं, भ्रमित ना हो किसी नाम में, हूं अधीर मैं, मैं ही संतुष्ट हूं। निर्मल भी मैं, मैं ही अशुद्ध हूं, मैं शीत हूं, मैं ही रुद्र हूं। मैं शून्य हूं, मैं क्षुद्र हूं, मैं मौन हूं, मैं गौण हूं, प्रश्न यह की कौन हूं मैं? - #ShubhankarThinks