यह कविता सत्य घटना पर पूर्णतयः आधारित है, जिसमें मैंने ऐसे गंभीर मुद्दे के साथ न्याय करने का एक छोटा सा प्रयास किया है, इसीलिए आपसे निवेदन है की जरूर पढ़ें | प्यारे पापा , मैं आपकी लाड़ली बेटी, जिसकी फ़िज़ूल की बातें आप बड़े चाव से सुना करते थे, मगर अब तो काम की बातें सुनने के लिए भी आपके कान इजाजत नहीं देते शायद! खैर ,मैं यह पत्र तंज कसने के लिए नहीं लिख रही, किसी को नीचा दिखाने के लिए नहींं लिख रही| आपको याद होगा ना जब आपने , मेरा रिश्ता तय कर दिया था मेरा किसी के साथ, उस उम्र में जब स्कूल का रास्ता तय कर पाना भी मेरे लिए मुश्किल था| 10 साल की थी तब मैं और स्कूल पूरे 5 किलोमीटर दूर था| मैंने तब भी कुछ कहा नहीं था, क्योंकि मुझे भी नहीं पता था यह सब क्या है? खैर उस बात को अब 7-8 साल हो चुके| समय बदला और समय के साथ मुझे एक बात समझ में आई है, वो लड़का मेरे लिए सही नहीं है, यह रट मैंने बहुत दिनों से लगाई है| शायद इसी वजह से आप अब सुनते नहीं मुझे, मगर आज यह बात तो मैं आपको सुनाकर रहूँगी| वो आपकी मौजूदगी तो कभी गैरमौजूदगी में घर आ जाता है, मम्मी और आप दोनों को मीठी बात...