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देह का प्रतिद्वंद्व


कुछ वक्तव्य हैं जो नि:शब्द हैं,
रोचक शब्द हैं वो नेपथ्य में,
मार्गों में भटकता रक्त है,
श्वास भी पथ भ्रष्ट है।
मद पान में सम्मिलित अधर हैं,
रोमांचित हो रहे शिखर हैं।
नव स्वप्न मन में उग रहे हैं,
रोम छिद्र चुभ रहे हैं।
मुख रुधिर वर्ण में ढल गए हैं,
कंपित हृदय भी जल रहे हैं।
देह के इस प्रतिद्वंद्व में,
विस्मृत हुए सभी छंद हैं।
#Erotica
#ShubhankarThinks

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