कभी तपती दुपहरी में मैदान के बीचों - बीच खड़ा है! आज इसी दिन के लिए वो तूफान - सा दौड़ा है! प्रथम आया है वो प्रतियोगिता में तभी गर्वित होकर चयनित खड़ा है! कुछ करने की ललक है हौसलों में इसके तभी देश सेवा के लिए बिल्कुल उत्सुक खड़ा है! फिर गांव की गलियॉं सुनसान कर चला वो अपने घर को एकदम वीरान कर चला वो आखिर देश की रक्षा करनी है उसको अचानक दोस्तों को भी हैरान कर चला वो मॉं की आखों में अश्रु ला कर एक मॉं की खातिर अभिमान से चला वो ! मॉं तो आखिर मॉं होती है ममता को सन्नाटे में गुमनाम कर चला वो ! आगे का क्रम कुछ ऐसे बढ़ा फिर आज वो सिपाही पर्वत पर खड़ा है बर्फ पड़ रही है पर्वत के तल पर भीषण ठंड़ में भी चट्टान - सा अड़ा है! देश का रक्षक है वो आखिर तभी तो इतने गुमान से खड़ा है! बाहर का प्रहरी तो ये है मगर अब अन्दर का क्रम कुछ ऐसे बढ़ा है! राजनीति का जैसे जुनून - सा छाया है लोगों को कुछ अलग शौक चढ़ा है! वाद - विवादों की सीमा नहीं अब देशभक्ति शब्द खुद कटघरे में खड़ा है! वोटों की राजनीति के बोझ तले दबकर वो विकास कहीं गर्त ...