कुछ समतल नहीं है,
जिंदगी चल रही है।
कहीं ये उछल रही है,
कहीं ये ढल रही है।
जिन्दगी उछल रही है
और चल रही है,
जहां पर ढल रही है
वहां भी चल रही है।
कभी ये फल रही है,
कभी ये जल रही है।
कभी सफल रही है
कभी विफल रही है,
तब भी जिन्दगी चल रही है।
कुछ निश्चित नहीं है,
भय किंचित नहीं है,
भले ठोकर लगी हैं
पथ से भ्रमित नहीं है।
बुरी हो या अच्छी
हर घड़ी ढल रही है,
बस जिंदगी चल रही है।
#ShubhankarThinks

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