एक दिन सब थम जायेगा, तुम रुकोगे जब अपनी दौड़ से थक कर, तुम देखोगे कितना खाली है सब, कितना खोखला रह गया वह सब जिसे मैं भर रहा था इतने सालों से। इतना सब भर लेने के बाद भी खालीपन आख़िर कहाँ है? तुम उस दिन जानोगे जैसे व्यर्थ ही दौड़े तुम, तुम्हारे सपने, इच्छा सब पूरे होने के बाद भी फिर फिर बड़े होते जा रहे हैं, जो सपने पूरे हुए उनसे कुछ हासिल नहीं हुआ, खालीपन बरकरार है पूरा का पूरा। तुम्हें लगेगा जैसे तुम्हें ठग लिया किसी ने, जो सब तुम दौड़ दौड़ कर भर रहे थे दोनों हाथों में, अब जाने क्यों ढ़ीली पड़ गईं दोनों मुट्ठी, कुछ इच्छा ना रही अब पकड़ बनाने की, तुम जान रहे हो कि सब मुक्त रहें तो ज्यादा अच्छा है वरना बहुत झंझट हैं पकड़ कर रखने में। तुम होश में पहली बार जान रहे हो कि शरीर घट रहा है, हर दिन हर पल हर क्षण, मौत हर क्षण खड़ी है साथ ही, तुम पूरे होश में स्वीकार कर पाते हो अपनी मृत्यु का सत्य भी, फिर कठिनाई नहीं लगती यह स्वीकार करने में कि मैं भी करोड़ों लोगों के जैसा ही हूँ, जो मेरी तरह यहाँ आये थे रहे यहां पर और फिर किसी अगले क्षण चले गए खाली हाथ सब यही छोड़कर। मैं विशेष नहीं हूँ बहुत सामान्...