चैन और सुकून से भरा था मुहल्ला, आवाम ए हिन्द बडी मौज में रहती थी| महफिल ए शायरी करते थे लोग वहां, मुशायरे में होती थीं रौनकें जहां की! कोई शमा मुजलिस में मशगूल होती थी| मुफलिसी में रहते थे वो फकीर वहां के, मगर उनकी बातों में भी अमीरी सी होती थी| हुस्न ए अदा थी तहजीब में उनके, तालीम की पहचान भी अदब बातों से होती थी | एक बाज की नजर ए बाद थी बस्ती पर , उसे आवाम के चैन अमन से तकलीफ सी होती थी| कुदरत का बदस्तूर जमाने पर नागवार गुजरा, उस बाज ने कुछ नापाक तरकीब सी सोची थी| एक जगह थी सबके पानी पीने की, जहां मुहब्बत अदब से सबकी भरपाई होती थी| मजहबी जहर को मिलाया था पानी में , अब पानी की जरूरत तो लगभग सभी को होती थी| पानी पीना जंग ए मैदान बन गया , अब पानी के लिए लोगों में तकरार सी होती थीं| धीरे धीरे जहर असर दिखाने लगा था, बाज की तरकीब अब कामयाब हो रही थी| तकरारों का सिलसिला रफ्तार से बढा फिर, अब मौका ए वारदात पर मौंते भी हो रही थी| पैगाम ए अमन तो ख्वाबों में भी नहीं था, महफिलों में भी अब नफरत ए दास्तां होती थी| अमन और मुहब्बत तो सब किस्से बन गये, अब तो रातें भी वीरानियों के मंजर में...