बेशक पढ़ लिए हैं वो इल्मी किताबें बहुतायत में, क्या फ़ायदा गर बातों में अब भी सरलता नहीं है| कोशिश कर रहा है इन्सां पैरों से आसमाँ तक चढ़ने की, बिना पर की पैदाइश है इसलिए कोई सफलता नहीं है| पड़ती है तो पड़ जाने दो किसी पर मार वक़्त की, ठोकर खाने से पहले कोई भी संभलता नहीं है| मत करो गुज़ारिश किसी से बदल जाने की, बिना खुदगर्ज़ी कोई यूँ ही बदलता नहीं है| कुछ लोग रहते हैं ऐसे गुमान में अपने, जिन्हें लगता है की सूरज कभी ढ़लता नहीं है| तुम अकेले चलो, किसी को खींचा मत करो साथ में, ऐसे जबरदस्ती कोई किसी के भी साथ चलता नहीं है| थम जाता है सब कुछ मुश्क़िल घड़ी में, तब वक़्त का आँकड़ा भी ठीक से चलता नहीं| कुछ लोग अँधेरे में बेवज़ह इतने हताश हुए जाते हैं, क्यों लग रहा है उनको कि कभी दिन निकलता नहीं है| #ShubhankarThinks