पहले आधी से ज्यादा जिंदगी सोचने में लगा दी, अब सदमे में हैं लोग कि जिंदगी व्यर्थ जा रही है| सबकी चाहत होती है दिक्कतें ना हो कभी, मुश्किलें हैं तभी तो आसानी समझ आ रही है! कोई कमाता है इतना की खपत भी नहीं है, कहीं रोज़ी रोटी जुटाने पूरी उमर जा रही है। घुमा फिरा के चीजें जटिल बन गई हैं, वरना जीने की कला तो सरलता रही है। जहां हंस बोलकर वक़्त भी काटा जा सकता था, वहां नफरतों की पूरी फसल आ रही है! सब जानते हैं कि दुःख सब दिमागी उपज हैं, फिर भी चिंता है कि डायन खाये जा रही है। भीड़ दौड़ रही है बहुत कुछ पा लेने को, भीड़ खाली हाथ धरती से चली जा रही है। ~ #ShubhankarThinks