चिंगारी उठी कोई फिर , छिट पुट सी बातों में जलने लगा शहर मेरा ! ना होश है उन्हें अपनों का , ना रहा कोई तेरा मेरा | किसी ने बीच में जाकर सभी से प्रश्न ये पूछा ? "क्या यही सिखलाता है मजहब - धर्म तेरा ?" मचलकर लोग गुस्से में तुनक कर गुमान से बोले "ये शुरुआत थी अभी तक कि , हम पूरा जहाँ जला देंगे !" बड़ा विचलित हुआ वो सुनकर फिर भयभीत से कठोर स्वर में बोला - " ये लो माचिस और ये ईंधन भी , जला दो अब ये शहर सारा! ये घर सारे जला देना, जला देना वो चौराहा ! वाहन भी जला दो तुम, दुकानें भी जला देना ! किसी के आशियाने उजाड़ दो तुम, किसी की रोजगारी जला देना | जला दो वो शिला लेख सारे, जिसमें इंसानियत का सबब हो! जला दो वो तहज़ीब विरासत भी, जिसमें आदाब-ओ - अदब हो | वतन परस्ती की इबादतें भी , कानूनी हिसाब तुम जला देना ! मानवता सिखाने वाली, किताबें तुम जला देना| जलाकर राख कर दो तुम , मेरे देशी अरमानों को ! रहे बाकी कुछ जलाने को, तुम मुझको भी जला देना | बनेगी राख जब इन सबकी , हवा में मिलावटें होंगी! तुम्हारे इन साफ चेहरों पर , कल जब कलिखें होंगी ! भले ही दर्ज ना हो तुमपर कोई आपत्ति अद...