ज़िंदगी सीधे चलकर तो किसी के पास नहीं आती है,
है कुछ ना कुछ बात सबके पास जो उनको खाती है।
सब्र टूट जाता है, गिर जाते हैं ख़्वाब किसी पतझड़ के जैसे,
फिर भी आते हैं दिन बहार भी, हमेशा यूं ही आंधी नहीं आती है।
खोखले मन से ना बढ़ाया करो किसी से दोस्ती का हाथ,
ऐसे जबरदस्ती के मेलोजोल में ना कोई बात रह पाती है।
बच बच कर चलने में कोई फ़ायदा नहीं,
जितना खर्च हो जाए उतनी अच्छी है जिंदगी,
वरना कोई ना कोई कसक मन में रह ही जाती है।
डूबते जहाजों पर चढ़ने में भी क्या खतरा,
महफूज़ किनारों में भी कैसी बे-खौफी?
कश्ती एक ना एक दिन तो सबको डुबाती है।
~ ShubhankarThinks
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