सबसे आसान काम है दूसरे में कमी खोजना, किसी के झूठ को पकड़ लेना। मुझे अभी तक लगता था कि शायद मुझे कोई दिव्यदृष्टि मिली हुई है कि मैं सामने वाले के चेहरे से उसका झूठ पढ़ लेता हूं या फिर उसकी एक बात बोलने के ढंग से उसकी चाल, मंशा या उद्देश्य समझ लेता हूं। लेकिन कई साल के इस वहम के बाद मुझे समझ आया कि मुझे दूसरा कैसे दिख रहा है आसानी से, खुद के ऊपर तो मेरी दिव्यदृष्टी नहीं जा पाती, क्या ये इतना कठिन काम है?
तो यह मेरा एक नया अनुभव है कि मैं अपने झूठ पकड़ने में ढील देता हूं या फिर मेरा घमंड मुझे रोकता है यह स्वीकार करने में कि मैं भी झूठ हो सकता हूं, मेरे अंदर भी ऐसे विचार उठ सकते हैं, जिनका उद्देश्य हो कोई, कोई मंशा हो, कोई वासना हो। खैर मुश्किल तो है खुद का झूठ पकड़ना, उससे थोड़ा ज्यादा मुश्किल है उसे स्वीकार करना और सबसे ज्यादा मुश्किल है सबके सामने यह स्वीकार करना क्योंकि ऐसा करने से आपकी जो छवि आपने सबके सामने बनाई है वो टूट जाती है। ऐसे में खतरा है कि आप अकेले हो जायेंगे और भीड़ का हिस्सा नहीं बन पायेंगे।
भीड़ से जुड़ने का रास्ता ही यह है कि दूसरा गलत मैं सही, अब जब आप खुद ही अपने झूठ को सबके सामने लाओगे तो इस किस्से में कोई दिलचस्प बात नहीं बनेगी ख़ैर सब फिजूल की बात लिख रहा अभी मैं।
कुल मिलाकर झूठ को पकड़ने की कोशिश करता हूं मैं, लेकिन बहुत बार ध्यान नहीं रहता लेकिन जरूरी है ये अभ्यास मेरे लिए, लिख रहा हूं ताकि जितने बार यह पढूं मुझे याद अजायें ये बातें।
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