सच ये है कि आप सुनना नहीं चाहते हैं अपने कानों से बाहर की बात,
सच ये है कि आप सहन नहीं कर पाते अगर सच आपके पाखण्डों से बाहर खड़ा होकर बोल रहा है,
सच यह है कि आप सुनना चाहते हैं उतना सच जितना आपके सीमा में आता है, जितना आप हजम कर पाते हो,
जितना सच आपके अहम को तोड़ नहीं रहा है,
जितना सच आपके अनुभव , निष्कर्ष को बढ़ावा देता हो।
उतना सच जितने में काम चल जाये आप कह सकें कि देखो मैं सच में विश्वास रखता हूँ।
उतना सच जितना आपके धर्म को लेकर मिली सीखों को समर्थन करे,
उतना सच जितना आपको किताबों ने बताया है और आपने माना हुआ है।
उतना सच जितने में आपको असहज महसूस ना करना पड़े अपनों के बीच।
उतना सच जिसे भीड़ समर्थन दे और आपकी पीठ थपथपा दे।
उतना सच जितने में आप अपने सारे स्वार्थ सिद्ध कर लें और आपकी छवि बरकरार रहे।
उतना सच जितने में आप अपनी गलत अवधारणाओं को भी सही बता सकें।
पूरा सच सहन करने के लिए बुद्धि नहीं चाहिए होती, उसके लिए नहीं चाहिए सिद्धान्तों का अध्ययन।
उसके लिए चाहिए सरलता, इतनी सरलता कि जिसका अहम कुछ रहा नहीं अब,
इतना सरल कि जिसका कोई प्रकृति के साथ संघर्ष ना रहा हो।
इतना सरल की जो बह सके नदी के जैसे शान्तिपूर्ण,
इतना सरल जो भीड़ में दिखाई ना दे, जो विशेष बनने का प्रयास भी ना करे।
इतना सरल कि तैयार हो कहीं भी झुकने के लिए,
जो जमीन पर हो पूरा, जिसमें कोई गुण अवगुण का आँकलन ना हो।
जो अकारण करने को तैयार हो सब कर्म,
जिसका मोह ना रहा हो, ना अर्थ में ना अर्थहीनता में
वो कर सकता है, सच की बात वो उतार सकता है सत्य को वैसे ही जैसा है।
~ #ShubhankarThinks
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