जीवन है तो मौसम हैं, मरने के बाद बस एक मौसम रहेगा।
फिर कभी नए नए मौसम देखने का मौका ना रहेगा।
जीवन है तो आयेंगे उबासी भरे दिन, कभी बसंत महोत्सव
कभी पतझड़ कभी बरसाती काली रातें।
तुम चलते रहना अपनी राह, चाहे कोई भी हो।
तुम बदल मत लेना चलने का ढ़ंग सिर्फ़ इसलिए
क्योंकि पूरी दुनिया तुम्हारे साथ गलत कर रही है।
तुम रुक मत जाना देखकर कि कितना आसान है सब यहाँ,
जहाँ तुम्हारे लिए सब कुछ उपलब्ध हो बिना किसी कठिनता के।
तुम बहक मत जाना सुख देखकर, रखना याद की ये केवल एक मौसम है बदल जायेगा,
तुम मन मत बना लेना सबसे कट जाने का इसलिए कि तुम्हारे साथ कोई ज्यादती हुई है,
तुम ख़ुद से बचकर मत भागना इसलिए कि तुम में कमियाँ बहुत हैं।
तुम कोई बोझ मत लाद लेना, अपने कंधे पर की तुम्हारे बिना ये सब काम कोई और ना करेगा।
तुम होना खड़े किसी रास्ते पर, देखना ऊपर आसमान में और देखना फिर अपने शरीर को,
कोई फ़र्क नहीं है तुम में और इस खुले आसमान में।
तुम ऐसे चलना जैसे कोई राजा चलता है, ऐसे बोलना जैसे राजा बोलते हैं।
तुम राजी मत हो जाना किसी के गुलाम बनने को, तुम देना सबको जितना दे सको,
देखना मत मुड़कर पीछे की तरफ, राजा देते हैं बस दे देते हैं।
वापस मांगने की इच्छा तुम्हें भिखारी बना रही है।
तुम चलना ऐसे ही अपनी धुन में गुनगुनाते हुए,
कभी किसी मोड़ पर सामना होगा हादसे से,
जब तुम्हारे सामने सन्नाटा पसर जाएगा, धक्क से रह जायेगा दिल
जैसे फट गया बादल तुम्हारी आँखों के सामने,
भय से काँप उठेगा मन, रखी रह जायेंगी ये सब बातें जो तुम्हारा हौसला बढ़ा रही थीं।
टूट जाएंगे सब बाँध जिनके सहारे तुम मस्ती में चल रहे थे।
तब तुम्हें दिखेगा रास्ता बचकर भागने का, आसान लगेगा भागना,
तुम तब डरना मगर भागना नहीं, खड़े होना, देखना अपनी आंखों से सब कुछ,
देखना अपनी काँपती हुई सांसे, देखना शरीर का काँपना,
देखना अपनी टाँगों को कमजोर होते हुए,
तुम स्वीकार करना खुद के तुच्छ होने की स्थिति,
बचना मत, खड़े होकर जानना कि तुम कुछ भी नहीं हो।
देखना फिर आसमान में देखना कैसे बिजली कड़क रही हैं,
कैसे टुकड़े में बंट गया उसका विशाल नीलापन।
तुम फिर देखना नीचे जमीन को वो इतनी बड़ी होने के बावजूद भी काँप रही है।
देखना खुद को फिर जानना तुम अलग नहीं हो इनसे,
फिर खड़े होना राजा की तरह ही,
चुका देना सारे उधार, कहना अपनी नियति से,
चलो अब किधर चलना है,
तब तुम महसूस करोगे हल्कापन,
तब तुम्हारे होठों का कंपन शांत होने लगेगा,
अब तुम्हारी टाँगें वजन से धरती में घुसी नहीं जा रही हैं,
अचानक से हट गया सारा वज़न,
अब वो जमीन पर नहीं जैसे हवा के साथ उड़ रही हैं।
काले बादल कब बदलकर साफ़ हो रहे पता ना चलेगा।
मौसम कब पलटी मार गया तुम्हें अंदाजा ना रहेगा।
तुम चलना फिर अपनी वही मस्ती में कोई धुन गुनगुनाते।
इतने में मौसम दूसरा कोई आता ही होगा।
Comments
Post a Comment
Please express your views Here!