विस्तार वृक्ष जितना हो तो फिर ठीक है,
वृक्ष की छाया रहती है सदा जैसे,
दो चार लोग बैठे तो अच्छा लगता है उसे भी,
मगर ऐसी कोई इच्छा भी नहीं कि कोई रहे पास हमेशा।
ख़ुशी मिलती है उसे जब बच्चे खेलते हैं उसके अगल बगल में,
ख़ूब झूमता है सब पत्तों को लेकर साथ में,
जब कोई नहीं रहता तो उखड़ नहीं जाता है अपने स्थान से,
व्याकुल नहीं होता है कि बच्चे आज खेलने नहीं आये,
उसे तीव्र इच्छा नहीं होती कि उस पर समाज ध्यान दे कि
वो सबको कितनी छाया शीतलता दे रहा है निःस्वार्थ भाव से।
वो खड़े होकर चार लोगों से यह नहीं कहता कि मैं इतना विशाल हूँ,
इतनी गहरी जड़ें हैं, मेरी शाखा गगन चूम रही हैं।
आपने सुना नहीं होगा किसी वृक्ष को यह कहते हुए की
इस व्यक्ति को मैं छाया नहीं दूँगा इसने मेरी शाखा काट ली थी।
द्वेष, घृणा उसने जाने ही नहीं कभी तभी तो इतना विशाल हो पाया,
वरना रह जाता कहीं खरपतवार की भीड़ में,
जहाँ झुंड से होती उसकी पहचान।
विस्तार हो तो वृक्ष जैसा करना,
वरना रखे रखना खुद को किसी सुंदर गमले में
छाया ना सही कम से कम सुंदरता बढ़ा सकोगे किसी के घरौंदे की।
मत बन जाना कोई बिन पत्तों का पेड़
जिस पर ना फल आये ना फूल आयें ना कोई बैठ सके तुम्हारे पास।
वृक्ष देता है सबको बिना किसी किसी लालसा के,
ख़ुश होगा अगर तुम धन्यवाद करो आलिंगन में भर के
अगर नहीं भी किया तो उसे दुःख नहीं होगा,
धन्यवाद मिले ऐसी कोई आसक्ति नहीं है उसकी।
वो रहेगा भीड़ में और एकांत में भी,
दुःख सह लेगा सारे अकेले में ही।
भनक लगने ना देगा अंत समय तक,
गिर पड़ेंगी शाख सभी एक एक कर।
अब रह जायेगी एक ठूँठ खड़ी हुई,
उतर चुकी होगी चमड़ी और हड्डी अकड़ी हुई।
छाया देने जितनी अब सामर्थ्य नहीं है,
ये हड्डी भी उसकी व्यर्थ नहीं है।
रहते हैं इसमें परिवार अभी भी,
पंछी मना रहे वहाँ त्यौहार अभी भी।
कभी बारिश के मौसम में घटायें घिरेंगी,
उमड़ेंगे मेघ, जमीं पर बिजली गिरेंगी।
वो उखड़ जाएगा जड़ से और थोड़ी आवाज होगी,
पेड़ चला जायेगा चुपचाप, वहाँ सिर्फ़ लाश होगी।
~ #ShubhankarThinks
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