बंद आँखों से "मैं" का जब पर्दा हटाया,
कहने और करने में बड़ा फ़र्क पाया।
सब समझने के वहम में जीता रहा "मैं",
सच में समझ तो कुछ भी नहीं आया।
रहा व्यस्त इतना सच्चाई की लाश ढोने में,
कि जिंदा झूठ अपना समझ नहीं आया।
कारण ढूँढता रहा हर सुख दुख में,
अकारण मुझे कुछ नज़र नहीं आया।
ढूँढता रहा सब जगह कुछ पाने की ललक से,
जो मिला ही हुआ है वो ध्यान में ना आया।
फँसता गया सब झंझटों में आसानी से,
सरलता को कभी अपनाना नहीं चाहा।
झूठ ही झूठ में उलझा हुआ पाया,
आंखों से जब जब पर्दा हटाया।
~ #ShubhankarThinks

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