रस कोई रग-रग से निर्झर बह रहा है,
उद्गम से अनभिज्ञ फिर भी चित्त शांत रह रहा है।
हैं जो अनगिनत प्राचीर दिन दिन गिर रही हैं,
कुछ अध गिरी दीवार पर से बह रहा है।
कल तक भू गर्भ में विस्मृत फंसा था,
वो बीज अब बाहें फैलाए बढ़ रहा है।
किए गए थे आयोजन जिस घोंसले में,
आज वो घर चहचहाहट से भर रहा है।
नाचता है रोम रोम संगीत धुन पर,
गीत कोई प्रकृति में बज रहा है।
किन्हीं संकरे पर्वत के दल में,
जैसे बह रहा जल, कल कल के क्रम में,
ऐसा कोई नाद मन में हो रहा है।
कुछ रह रहा है शेष फिर भी,
शेष सब में खो रहा है,
है कोई दलदल भी भीतर,
"मैं" वहीं कहीं धंस रहा है,
बस रहा सब कुछ ही भीतर,
कुछ रोज रोज खो रहा है।
~ #ShubhankarThinks

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