लोग ज़िंदा हैं ऐसे जैसे एहसान जता रहे हैं,
जी कम रहे हैं, सबको बता ज्यादा रहे हैं।
उधारी में लेते हैं सांस भी सोच समझकर,
जैसे बची हुई सांसों से किश्त पटा रहे हैं।
ख़ुशी के लिए किए बैठे हैं, हसरतों की डाउनपेमेंट,
पजेशन के लिए कमबख्त हंसी बचा रहे हैं।
दो तीन की गिनती में बुरे फंस गए हैं,
ख़ुद के गणित में ही ख़ुद को फंसा रहे हैं।
जी रहे हैं दस प्रतिशत बड़े रूखे हुए मन से,
बाकी नब्बे प्रतिशत बच्चों के लिए बचा रहे हैं।
गले में कुछ भी फांस लेना प्रथा बन गई है,
आंखें मूंदकर सभी ये किए जा रहे हैं।
दुख में रहना एक बहादुरी का काम है,
घूंट घूंट इस जहर को पिए जा रहे हैं।
मूल काट रहे हैं थोड़ा थोड़ा करके,
लोग पत्तों की सजावट में जान लगा रहे हैं।
लोग जी कम रहे हैं, दिखा ज्यादा रहे हैं।।
~ #ShubhankarThinks

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