दृश्य :
देहात की साधारण रोडवेज बस, जिसके महत्व का अनुमान आप केवल इस बात से लगा सकते हैं कि सलमान, शाहरुख या अक्षय कुमार को देखकर जितनी भीड़ उनकी तरफ भागती है, उससे थोड़ी बहुत कम भीड़ रोडवेज़ बस के पीछे भागती है, भीड़ बेशक कम रहती है मगर उत्साह और पाने की लालसा के मामले में किसी भी तरह की कमी नहीं रहती है। ऐसे में आप राष्ट्रीय सेलिब्रिटी ना सही कम से कम क्षेत्रीय सेलिब्रिटी तो बोल ही सकते हो। बस फ़र्क इतना है कि किसी फिल्म अभिनेता के मैनेजर वगरह सारे इंतेजाम करते हैं कि कोई आस पास भी ना पहुँच पाये और बस के मैनेजर साधुवाद और समभाव के सिद्धांतों का पालन करते हुए, लोगों को सीट, पायदान, खिड़की, इंजन और छत से लेकर पीछे वाली सीढ़ी तक लटकने का कोई विरोध नहीं करते हैं। यह बात अलग है कि बस की स्पीड, ड्राइवर की कारतूत और खराब ग्रह, नक्षत्रों के चलते कुछ लोग खिड़की आदि से लटककर सड़क से घिस जाते हैं या फिर अधिक चोटिल हो जाते हैं और कभी कभी शहीद भी हो जाते हैं मगर इसमें उन लोगों का दोष बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि वो तो अपनी तरफ से सुरक्षित स्थान पर खड़े थे। मैं तो सारा दोष वक़्त को दूँगा, जब खराब वक़्त हो तो सड़क चलते इंसान को भी टक्कर मार सकता है, वो बात अलग हो सकती है कि वो बेचारा कार वाले को बताना भूल गया था कि उसे कार के सामने आकर एक स्टंट करना है। मैं यहाँ दोष कार वाले को दूँगा हो सकता है उसका राहु सही नहीं हो। इन सब सिद्धान्तवादी नीतियों के चलते सुरक्षा आदि मामूली विषय भले ही रोडवेज को तरफ से तिरस्कृत किये जाते हों मगर समाज सेवी संस्था से जुड़े कुछ लोग यह जिम्मा निःस्वार्थ उठाते हैं। जानकर चौंक ना जाइय, अन ऑफिसियल ही सही मेडिकल की पूरी सुविधा की जाती है, बशर्ते आप बस के अंदर रहें। अब आप बस के अंदर अगर सीट पर बैठे हैं तो ऐसे में सरदर्द, बदहज़मी, पैरों में दर्द या फ़िर घुटनों में परेशानी होना लाज़िमी है, इसका मुख्य कारण है, रोडवेज बस की आरामदायक सीट व्यवस्था। जिसको डिज़ाइन करने के बाद डिज़ाइनर के हाथ कटवा दिए गए होंगे, थोड़ा सा विस्तार से बताऊँ तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक दृष्टिकोण दोनों का समन्वय आपको देखने को मिलेगा। जैसे एक सीट से दूसरे सीट के बीच में स्थान इतना कम रखा गया है कि एक बार अगर इंसान ने पैर फँसा लिए अच्छे से तो बस पलट भी जाये तो वो इंसान वहाँ से टस से मस नहीं होगा। ऐसे वैज्ञानिक सोच सीट बेल्ट जैसी व्यवस्था को धता बता देती है। वहीं दूसरे सिरे से देखें तो खिड़की आदि की क़्वालिटी इतनी अच्छी रखी जाती है कि वो एक जगह पर रुक जाती है ऐसे में हर सीट पर अलग तरह की सुविधा होती है, उदाहरण के तौर पर अगर किसी सीट को हवा आने के अधिकार प्राप्त हैं तो सीट पर बैठे सभी लोग और आस पास के भी लोगों को वो सुविधा राजी गैर राजी से स्वीकार करनी होगी। क्योंकि कोई चाहकर भी खिड़की नहीं बन्द कर सकता क्योंकि क़ानून अर्थात खिड़की की मशीनरी आपको उसकी इजाज़त नहीं देगी। इसमें आप संवैधानिक व्यवस्था की हल्की फुल्की झलक देख सकते हो।
अब मैं अगर यहाँ सामाजिक व्यवस्था पर चर्चा शुरू करूँ तो बात बड़ी हो जाएगी इसलिए वापस आते हैं चिकित्सा व्यवस्था की यह व्यवस्था ठीक वैसे दी जाती है, जैसे प्लेन के टेक ऑफ के समय सुरक्षा संबंधी बातें बताई जाती हैं, ठीक वैसे ही बस में भी बस शुरू होने से पहले एक दो व्यक्ति झोला लेकर आते हैं और पहले सभी को कुछ जरूरी निर्देश, बीमारी के लक्षण और संभावनाएं आपको बड़े ही रोचक ढँग से बताते हैं और उसके बाद उनके सरल और प्रभावी उपाय भी बताते हैं । और अपने झोले से एक दो दवाई मुफ़्त में प्रयोग करने का निमन्त्रण प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के देते हैं और तो और अनुरोध भी करते हैं। मुझे नहीं लगता कि इससे ज्यादा ख्याल आपका और किसी सरकारी विभाग में रखा जाता होगा। जहाँ 10,20 या 30 रुपये में जोड़ों के दर्द से लेकर सर दर्द या फिर गले संबंधी जैसी समस्या की आल इन वन दवाये दी जाती हैं।
ऐसे में एक ही बात समझ आती है कि देखने वाले कि नजर होनी चाहिए। कई बार चीजें आँखों के सामने होते हुए भी हम देख नहीं पाते हैं।
#भारत_दर्शन
#ShubhankarThinks
देहात की साधारण रोडवेज बस, जिसके महत्व का अनुमान आप केवल इस बात से लगा सकते हैं कि सलमान, शाहरुख या अक्षय कुमार को देखकर जितनी भीड़ उनकी तरफ भागती है, उससे थोड़ी बहुत कम भीड़ रोडवेज़ बस के पीछे भागती है, भीड़ बेशक कम रहती है मगर उत्साह और पाने की लालसा के मामले में किसी भी तरह की कमी नहीं रहती है। ऐसे में आप राष्ट्रीय सेलिब्रिटी ना सही कम से कम क्षेत्रीय सेलिब्रिटी तो बोल ही सकते हो। बस फ़र्क इतना है कि किसी फिल्म अभिनेता के मैनेजर वगरह सारे इंतेजाम करते हैं कि कोई आस पास भी ना पहुँच पाये और बस के मैनेजर साधुवाद और समभाव के सिद्धांतों का पालन करते हुए, लोगों को सीट, पायदान, खिड़की, इंजन और छत से लेकर पीछे वाली सीढ़ी तक लटकने का कोई विरोध नहीं करते हैं। यह बात अलग है कि बस की स्पीड, ड्राइवर की कारतूत और खराब ग्रह, नक्षत्रों के चलते कुछ लोग खिड़की आदि से लटककर सड़क से घिस जाते हैं या फिर अधिक चोटिल हो जाते हैं और कभी कभी शहीद भी हो जाते हैं मगर इसमें उन लोगों का दोष बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि वो तो अपनी तरफ से सुरक्षित स्थान पर खड़े थे। मैं तो सारा दोष वक़्त को दूँगा, जब खराब वक़्त हो तो सड़क चलते इंसान को भी टक्कर मार सकता है, वो बात अलग हो सकती है कि वो बेचारा कार वाले को बताना भूल गया था कि उसे कार के सामने आकर एक स्टंट करना है। मैं यहाँ दोष कार वाले को दूँगा हो सकता है उसका राहु सही नहीं हो। इन सब सिद्धान्तवादी नीतियों के चलते सुरक्षा आदि मामूली विषय भले ही रोडवेज को तरफ से तिरस्कृत किये जाते हों मगर समाज सेवी संस्था से जुड़े कुछ लोग यह जिम्मा निःस्वार्थ उठाते हैं। जानकर चौंक ना जाइय, अन ऑफिसियल ही सही मेडिकल की पूरी सुविधा की जाती है, बशर्ते आप बस के अंदर रहें। अब आप बस के अंदर अगर सीट पर बैठे हैं तो ऐसे में सरदर्द, बदहज़मी, पैरों में दर्द या फ़िर घुटनों में परेशानी होना लाज़िमी है, इसका मुख्य कारण है, रोडवेज बस की आरामदायक सीट व्यवस्था। जिसको डिज़ाइन करने के बाद डिज़ाइनर के हाथ कटवा दिए गए होंगे, थोड़ा सा विस्तार से बताऊँ तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक दृष्टिकोण दोनों का समन्वय आपको देखने को मिलेगा। जैसे एक सीट से दूसरे सीट के बीच में स्थान इतना कम रखा गया है कि एक बार अगर इंसान ने पैर फँसा लिए अच्छे से तो बस पलट भी जाये तो वो इंसान वहाँ से टस से मस नहीं होगा। ऐसे वैज्ञानिक सोच सीट बेल्ट जैसी व्यवस्था को धता बता देती है। वहीं दूसरे सिरे से देखें तो खिड़की आदि की क़्वालिटी इतनी अच्छी रखी जाती है कि वो एक जगह पर रुक जाती है ऐसे में हर सीट पर अलग तरह की सुविधा होती है, उदाहरण के तौर पर अगर किसी सीट को हवा आने के अधिकार प्राप्त हैं तो सीट पर बैठे सभी लोग और आस पास के भी लोगों को वो सुविधा राजी गैर राजी से स्वीकार करनी होगी। क्योंकि कोई चाहकर भी खिड़की नहीं बन्द कर सकता क्योंकि क़ानून अर्थात खिड़की की मशीनरी आपको उसकी इजाज़त नहीं देगी। इसमें आप संवैधानिक व्यवस्था की हल्की फुल्की झलक देख सकते हो।
अब मैं अगर यहाँ सामाजिक व्यवस्था पर चर्चा शुरू करूँ तो बात बड़ी हो जाएगी इसलिए वापस आते हैं चिकित्सा व्यवस्था की यह व्यवस्था ठीक वैसे दी जाती है, जैसे प्लेन के टेक ऑफ के समय सुरक्षा संबंधी बातें बताई जाती हैं, ठीक वैसे ही बस में भी बस शुरू होने से पहले एक दो व्यक्ति झोला लेकर आते हैं और पहले सभी को कुछ जरूरी निर्देश, बीमारी के लक्षण और संभावनाएं आपको बड़े ही रोचक ढँग से बताते हैं और उसके बाद उनके सरल और प्रभावी उपाय भी बताते हैं । और अपने झोले से एक दो दवाई मुफ़्त में प्रयोग करने का निमन्त्रण प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के देते हैं और तो और अनुरोध भी करते हैं। मुझे नहीं लगता कि इससे ज्यादा ख्याल आपका और किसी सरकारी विभाग में रखा जाता होगा। जहाँ 10,20 या 30 रुपये में जोड़ों के दर्द से लेकर सर दर्द या फिर गले संबंधी जैसी समस्या की आल इन वन दवाये दी जाती हैं।
ऐसे में एक ही बात समझ आती है कि देखने वाले कि नजर होनी चाहिए। कई बार चीजें आँखों के सामने होते हुए भी हम देख नहीं पाते हैं।
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