कोशिशों की नीलामी सरेआम हो गयी है,
ज़िन्दगी अब बहुत ही आम हो गयी है!
बुनने उधेड़ने को कुछ बचा नहीं है,
दिन की मंज़िल अब "आराम" हो गयी है!
दिन ढलने लगा है, सूरज छिप सा रहा है,
कुछ पल तुम ठहर जाओ कब तक बढ़ोगे,
जिंदगी है संग्राम आखिर कब तक लड़ोगे!
पंछियों ने भी थककर हथियार डाल दिये हैं,
आज के सारे अरमान अब कल तक टाल दिए हैं।
कल किसने देखा? कौन आयेगा या कौन जायेगा,
आज सोचा हुआ "कल" आयेगा या नहीं आयेगा।
मगर वक़्त का पहिया तो घूमता ही जायेगा,
आने वाले कल भी एक नया "आज" आयेगा|
इस चक्कर में वक़्त की सुई बदनाम हो गयी है,
अब थम जा कुछ देर, शाम हो गयी है|

Comments
Post a Comment
Please express your views Here!