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#ShubhankarThinks
Image Credit - Pixabay
Note- यह मेरी अब तक कि कविताओं से बिल्कुल अलग लिखा है, लिखने के पीछे कोई खास वजह नहीं थी। आप अपनी राय कॉमेंट में बता सकते हैं। धन्यवाद।
रूह की मौजूदगी क्या कर पायेगी,
जिस्मों की सनसनी जब महफ़िल जमायेगी।
हैं तैयार दो बदन रुख़सत की शिरकत में,
हवस तौर से उतरेगी मोहब्बत की कसरत में।
गुनाह माफ़ कर देना अब इनसे तौबा ना होगी,
जिस्मानी हसरतें अब हौव्वा ना होगी।
लगाकर जाम होठों पर, शौक से मयकशी होगी,
फ़ेंक कर लिबास कोने में खूब बेकदरी होगी।
जिस्म ऐसे चिपक जाए, जैसे गोंद से जोड़ दिए हों,
बदन ऐसे झुके होंगे, जैसे कमर से मोड़ दिए हों।
रात खौफ़ में होगी कहीं वजूद ना हिल जाए,
आवाज़ों के डर से कहीं दिन ना निकल जाए।
पलँग चरचराहट में आज टूट ना जाये,
दोनों जी भर के खेलेंगे, कुछ भी छूट ना जाये।
#ShubhankarThinks
Image Credit - Pixabay
Note- यह मेरी अब तक कि कविताओं से बिल्कुल अलग लिखा है, लिखने के पीछे कोई खास वजह नहीं थी। आप अपनी राय कॉमेंट में बता सकते हैं। धन्यवाद।

kyaa baat....bahut dinon baad behtarin lekhan...👌👌👌
ReplyDeleteBhut dhanyawad apka sir apki comment hmesha prernadayak hoti hai
ReplyDeleteLikhta hu but thoda km 2 liner vgrh se tasalli de dete hai dil ko ab kya kre kavita likhne ke liye achha khasa waqt chahiye.
Baki apki kavitayen wakai chhaa rhi hai wordpress par