इस बार चित्रण थोड़ा आगे निकल चुका था। मानो जितने समय सुधीर व्यस्त हुआ उस वक्त का सारा अध्याय निकलकर आगे पहुंच गया हो...
"भैया वो बात ये है कि मैं इस लडकी से शादी नहीं कर सकता!" - विनोद ने संकोचवश बड़ी धीमी आवाज में बड़े भाई से फुसफुसाते हुए कहा।
इतना सुनते ही सुधीर के पैरों तले जमीन खिसक गयी आखिर बात ही ऐसी बोली थी।
हुआ ये था कि सुधीर अब २३ वर्ष का हो गया था और अच्छी खासी नौकरी भी लग गयी थी तो शक्तिप्रसाद को लगा कोई अच्छी लड़की देखकर इसकी भी शादी कर देता हूं। फिर सारे कर्मों से तृप्त होकर पत्नी के साथ तीर्थ दर्शन को निकल जाऊंगा।
सोचने की देरी थी, बिना किसी की मर्जी पूछे बोल दिया पंड़ित जी से "अगर कोई अच्छा रिश्ता आये तो बता देना।"
पहले दोनों बेटों की शादी ऐसे ही तय हुईं थीं। अब भला शक्तिप्रसाद का निर्णय कौन टाल सकता था। भाग्यवश पंड़ित जी की नजर में एक अध्यापक की लड़की सुनिधि थी, जो पढ़ाई में विलक्षण और गृहकार्य में दक्ष थी और रूप ऐसा कि मानो कामदेव अगर देख ले तो सहर्ष सेवक बनने को तैयार हो जाये।
सारे गुणों का अवलोकन करने बाद अगर उसे कोई देख ले, तो किसी देवी से कम नहीं लगेगी। क्योंकि लज्जा, शालीनता, कोमलता और सदाचार ये सभी उसके गुणों में शुमार थे। सुनिधि के पिता को भी सुयोग्य वर की तलाश थी, पंड़ित जी ने झटपट शक्तिप्रसाद से मिलवा दिया बस फिर क्या था! दोंनो का मिलाप ऐसे हुआ मानो दोनों पहले से ही सहमत थे। बस औपचारिकता मात्र की कमी थी, वो अब दूर हो गयी। आखिर विनोद भी बड़े शहर से पढ़ा था और आज अच्छे पद पर आसीन है। सुदूर गांव तक शक्ति प्रसाद के लड़कों के चर्चे होते थे और यह बात अध्यापक महोदय भली - भांति जानते थे।
बस फिर क्या था, पंड़ित जी से कहकर माथा छुआई की तिथि निश्चित कराई गयी और शक्तिप्रसाद ने घर जाकर बताया तो सभी खुश हुए और विनोद को भी फोन करके बुलवाया गया और आज घर का पूरा बरामदा खचाखच भरा हुआ है। एक तरफ महिलायें चूल्हे पर नाना प्रकार के पकवान तैयार करने में लगीं हैं, वहीं लगातार बड़ी खाट पंक्तिबद्ध लगीं हैं जिनपर अतिथि, कन्यापक्ष के लोग और गांव के बुजुर्ग भी बैठे हुए हैं। छोटे-२ बच्चों का समूह सारी पंक्तियों की भागकर परिक्रमा कर रहा था मानो ये कोई बाधा दौड़ की प्रतियोगिता हो।
और वहां सीढ़ियों के ठीक पास एक छोटी - सी खाट पर विनोद और सुधीर दोनों बैठे हुए हैं और सुधीर अभी तक सन्न - सा बैठा हुआ है मगर फिर भी थोड़ा धीरज रखकर कठोर स्वर में बोलता है - "आखिर क्यों? इतनी अच्छी लड़की है, पढ़ी - लिखी भी है और पिता जी ने पक्का भी कर रखा है।"
"भैया, आपकी बात सही है मगर मैं किसी को वचन दे चुका हूं और अब मैं उस लड़की के साथ कपट नहीं कर सकता।" - विनोद ने बड़ी निष्ठुरता से यह प्रक्षेपास्त्र सुधीर पर छोड़ दिया, जिसने सुधीर के हृदय का आन्तरिक छेदन कर दिया मगर भ्रातृ प्रेम के कारण उसने आह तक भी नहीं की और चुपचाप पिताजी को सारी बातें बताकर खुद शक्तिप्रसाद के गुस्से का शिकार बना काफी देर आग बबूला रहने के बाद शक्तिप्रसाद ने अध्यापक महोदय से क्षमा मांगते हुए उनके समक्ष अपनी बात रखी और उन्हें अतिथियों सहित विदा कर दिया और अब शक्तिप्रसाद की नजरें विनोद को यहां - वहां टटोल रहीं थीं। मगर विनोद घर पर हो तब दिखेगा ना! उसे तो सुधीर कब का शहर वाली बस में बैठाकर विदा करके आ चुका था।
आखिर शाम को शक्तिप्रसाद ने सुधीर से पूछा - विनोद कहां है?
"पिताजी वो जा चुका है!" - सुधीर ने उत्तर दिया।
शक्तिप्रसाद बैठक की ओर निरुत्तर - से चले गये। आज पहली बार उनके चेहरे पर अलग - सी शिकन थी। एकदम शांत बैठे विचारों की उधेड़ - बुन में लगे हुए थे। यह उनके जीवन का पहला अनुभव था जिसमें उन्हें पूरे गांव के सामने शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।
मगर एक तरफ देखें तो मधुमति बेचारी क्या करे , सुबह से खुशी - खुशी काम में लगी थी और अब सारे बर्तन समेटकर धोने लगी है और सुबह से श्वांस में परेशानी और ज्वर भी है फिर भी काम में पिसी पड़ी है। किसी को उसकी चिन्ता नहीं और वो अपने हृदय की भावनायें किसी से कह भी नहीं सकती।
आगे पढ़ें .....
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Part 1
Part 2
Part 3
Part 4
Part 5
Part 6
Part 7
Part 8
Part 9
"भैया वो बात ये है कि मैं इस लडकी से शादी नहीं कर सकता!" - विनोद ने संकोचवश बड़ी धीमी आवाज में बड़े भाई से फुसफुसाते हुए कहा।
इतना सुनते ही सुधीर के पैरों तले जमीन खिसक गयी आखिर बात ही ऐसी बोली थी।
हुआ ये था कि सुधीर अब २३ वर्ष का हो गया था और अच्छी खासी नौकरी भी लग गयी थी तो शक्तिप्रसाद को लगा कोई अच्छी लड़की देखकर इसकी भी शादी कर देता हूं। फिर सारे कर्मों से तृप्त होकर पत्नी के साथ तीर्थ दर्शन को निकल जाऊंगा।
सोचने की देरी थी, बिना किसी की मर्जी पूछे बोल दिया पंड़ित जी से "अगर कोई अच्छा रिश्ता आये तो बता देना।"
पहले दोनों बेटों की शादी ऐसे ही तय हुईं थीं। अब भला शक्तिप्रसाद का निर्णय कौन टाल सकता था। भाग्यवश पंड़ित जी की नजर में एक अध्यापक की लड़की सुनिधि थी, जो पढ़ाई में विलक्षण और गृहकार्य में दक्ष थी और रूप ऐसा कि मानो कामदेव अगर देख ले तो सहर्ष सेवक बनने को तैयार हो जाये।
सारे गुणों का अवलोकन करने बाद अगर उसे कोई देख ले, तो किसी देवी से कम नहीं लगेगी। क्योंकि लज्जा, शालीनता, कोमलता और सदाचार ये सभी उसके गुणों में शुमार थे। सुनिधि के पिता को भी सुयोग्य वर की तलाश थी, पंड़ित जी ने झटपट शक्तिप्रसाद से मिलवा दिया बस फिर क्या था! दोंनो का मिलाप ऐसे हुआ मानो दोनों पहले से ही सहमत थे। बस औपचारिकता मात्र की कमी थी, वो अब दूर हो गयी। आखिर विनोद भी बड़े शहर से पढ़ा था और आज अच्छे पद पर आसीन है। सुदूर गांव तक शक्ति प्रसाद के लड़कों के चर्चे होते थे और यह बात अध्यापक महोदय भली - भांति जानते थे।
बस फिर क्या था, पंड़ित जी से कहकर माथा छुआई की तिथि निश्चित कराई गयी और शक्तिप्रसाद ने घर जाकर बताया तो सभी खुश हुए और विनोद को भी फोन करके बुलवाया गया और आज घर का पूरा बरामदा खचाखच भरा हुआ है। एक तरफ महिलायें चूल्हे पर नाना प्रकार के पकवान तैयार करने में लगीं हैं, वहीं लगातार बड़ी खाट पंक्तिबद्ध लगीं हैं जिनपर अतिथि, कन्यापक्ष के लोग और गांव के बुजुर्ग भी बैठे हुए हैं। छोटे-२ बच्चों का समूह सारी पंक्तियों की भागकर परिक्रमा कर रहा था मानो ये कोई बाधा दौड़ की प्रतियोगिता हो।
और वहां सीढ़ियों के ठीक पास एक छोटी - सी खाट पर विनोद और सुधीर दोनों बैठे हुए हैं और सुधीर अभी तक सन्न - सा बैठा हुआ है मगर फिर भी थोड़ा धीरज रखकर कठोर स्वर में बोलता है - "आखिर क्यों? इतनी अच्छी लड़की है, पढ़ी - लिखी भी है और पिता जी ने पक्का भी कर रखा है।"
"भैया, आपकी बात सही है मगर मैं किसी को वचन दे चुका हूं और अब मैं उस लड़की के साथ कपट नहीं कर सकता।" - विनोद ने बड़ी निष्ठुरता से यह प्रक्षेपास्त्र सुधीर पर छोड़ दिया, जिसने सुधीर के हृदय का आन्तरिक छेदन कर दिया मगर भ्रातृ प्रेम के कारण उसने आह तक भी नहीं की और चुपचाप पिताजी को सारी बातें बताकर खुद शक्तिप्रसाद के गुस्से का शिकार बना काफी देर आग बबूला रहने के बाद शक्तिप्रसाद ने अध्यापक महोदय से क्षमा मांगते हुए उनके समक्ष अपनी बात रखी और उन्हें अतिथियों सहित विदा कर दिया और अब शक्तिप्रसाद की नजरें विनोद को यहां - वहां टटोल रहीं थीं। मगर विनोद घर पर हो तब दिखेगा ना! उसे तो सुधीर कब का शहर वाली बस में बैठाकर विदा करके आ चुका था।
आखिर शाम को शक्तिप्रसाद ने सुधीर से पूछा - विनोद कहां है?
"पिताजी वो जा चुका है!" - सुधीर ने उत्तर दिया।
शक्तिप्रसाद बैठक की ओर निरुत्तर - से चले गये। आज पहली बार उनके चेहरे पर अलग - सी शिकन थी। एकदम शांत बैठे विचारों की उधेड़ - बुन में लगे हुए थे। यह उनके जीवन का पहला अनुभव था जिसमें उन्हें पूरे गांव के सामने शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।
मगर एक तरफ देखें तो मधुमति बेचारी क्या करे , सुबह से खुशी - खुशी काम में लगी थी और अब सारे बर्तन समेटकर धोने लगी है और सुबह से श्वांस में परेशानी और ज्वर भी है फिर भी काम में पिसी पड़ी है। किसी को उसकी चिन्ता नहीं और वो अपने हृदय की भावनायें किसी से कह भी नहीं सकती।
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Part 2
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Part 4
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Part 9
Ok this part could have been more exciting but still for a reader who has been following, one is filled for admiration for Sudhir who has been the perfect example of a son, brother and friend to his family. Now please write the next part :)
ReplyDeleteMam actually I posted this part yesterday so it will take time to create next part soon I will publish
ReplyDeleteThank you so much for kinda appreciations !
You're most welcome 😊
ReplyDelete🙏
ReplyDelete😐😐 इंतज़ार रहेगा...
ReplyDeleteBss type krna baki h shayad kl tk ho jayega publish 😉
ReplyDeleteAise hi mera utsahvardhan krte rhiye
Dhanyavaad
😊😊 जी आपके साथ तो हमारा क्या सबका साथ हैं और रहेगा💐
ReplyDeleteBhut bhut dhanyavaad !
ReplyDelete[…] भाग-4 […]
ReplyDelete[…] भाग-4 […]
ReplyDelete[…] भाग-4 […]
ReplyDelete[…] भाग-4 […]
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