पिता को गुजरे कुछ दिन ही गुजरे थे ,
बेटों ने किया फिर सम्पत्ति का मुआयना !
और अब आन पडा था बंटवारा |
कुछ लोग बाहर से बुलाये गये ,
जमीनों के मूल्य आंक पर लगाये गये ,
क्योंकि अब आन पडा था बंटवारा|
कुछ चीजें बाप की कमाई हुईं थी,
कुछ चीजें मां ने सन्दूकों में छुपाई हुई थीं,
आज सबका हिस्सा होगा!
क्योंकि अब आन पडा है बंटवारा|
फिर क्या था जमीन को बाराबर बांटा गया,
हर चीज का बराबर मूल्य आंका गया ,
क्योंकि यही तो कहलाता है बंटवारा |
वो बूढी मां सब देख रही थी,
कभी बिलखती कभी मन ही मन मचल रही थी!
कुछ कसोट रहा था उसे मन ही मन में ,
जाने क्यों उसे भी नहीं रहा था ये बंटवारा|
मां कब तक अपने अन्तर्मन पर काबू पाती?
अपने ह्र्दय के ज्वार भाटा को कब तक दबाती?
फिर बोली कुछ सकपकाकर !
ऐसे कहां पूरा हुआ बंटवारा?
जमीन और चीजें तो सब बांट ली तुमने ,
अब यादें बांटने कौन आयेगा?
जिन्दगी भर खिलाया था तुमको,
उसका हिसाब कौन चुकायेगा ?
मैं अब भी कहती हूं मत करो ये बंटवारा!
बेटे कुछ झुंझलाकर बोले !
मां हमको जीने का हक नहीं है,
किया तो क्या किया उन्होने हमारे लिए ?
क्या ?उनकी सम्पत्ति पर हमारा कोई हक नहीं है !
आज ना रोको मां हमारे लिए जरूरी है ये बंटवारा |
मां अब कुछ शांत हुई फिर मन ही मन में बोली,
बंटवारे में मेरी ममता क्यों बाटते हो दुष्टो?
क्यों खाली करते हो मेरी झोली ?
मिलकर खाने में दोष भी क्या था?
क्या? संग भी नहीं मना सकते दीपावली , होली!
फिर बोली , हाय इतना बुरा होता है ये बंटवारा !
हाय इतना बुरा है ये बंटवारा ||
---- © Confused Thoughts
बेटों ने किया फिर सम्पत्ति का मुआयना !
और अब आन पडा था बंटवारा |
कुछ लोग बाहर से बुलाये गये ,
जमीनों के मूल्य आंक पर लगाये गये ,
क्योंकि अब आन पडा था बंटवारा|
कुछ चीजें बाप की कमाई हुईं थी,
कुछ चीजें मां ने सन्दूकों में छुपाई हुई थीं,
आज सबका हिस्सा होगा!
क्योंकि अब आन पडा है बंटवारा|
फिर क्या था जमीन को बाराबर बांटा गया,
हर चीज का बराबर मूल्य आंका गया ,
क्योंकि यही तो कहलाता है बंटवारा |
वो बूढी मां सब देख रही थी,
कभी बिलखती कभी मन ही मन मचल रही थी!
कुछ कसोट रहा था उसे मन ही मन में ,
जाने क्यों उसे भी नहीं रहा था ये बंटवारा|
मां कब तक अपने अन्तर्मन पर काबू पाती?
अपने ह्र्दय के ज्वार भाटा को कब तक दबाती?
फिर बोली कुछ सकपकाकर !
ऐसे कहां पूरा हुआ बंटवारा?
जमीन और चीजें तो सब बांट ली तुमने ,
अब यादें बांटने कौन आयेगा?
जिन्दगी भर खिलाया था तुमको,
उसका हिसाब कौन चुकायेगा ?
मैं अब भी कहती हूं मत करो ये बंटवारा!
बेटे कुछ झुंझलाकर बोले !
मां हमको जीने का हक नहीं है,
किया तो क्या किया उन्होने हमारे लिए ?
क्या ?उनकी सम्पत्ति पर हमारा कोई हक नहीं है !
आज ना रोको मां हमारे लिए जरूरी है ये बंटवारा |
मां अब कुछ शांत हुई फिर मन ही मन में बोली,
बंटवारे में मेरी ममता क्यों बाटते हो दुष्टो?
क्यों खाली करते हो मेरी झोली ?
मिलकर खाने में दोष भी क्या था?
क्या? संग भी नहीं मना सकते दीपावली , होली!
फिर बोली , हाय इतना बुरा होता है ये बंटवारा !
हाय इतना बुरा है ये बंटवारा ||
---- © Confused Thoughts
Sad reality described beautifully. :)
ReplyDeleteThank you ! I was waiting for your valuable comment 😊
ReplyDeleteWell, a valuable posts deserves a mere comment. :)
ReplyDeleteOh so nice of you 😇
ReplyDeleteबहुत सही
ReplyDeleteलिखते रहिए
बहुत बहुत धन्यवाद मैम
ReplyDeleteमाँ तक के तो टुकड़े कर लिए हमने । बहुत सुंदर रचना बहुत बहुत साधुवाद
ReplyDeleteमेरा उत्साहवर्धन करने के लिए धन्यवाद और आपको मेरा भूरि भूरि प्रणाम
ReplyDeleteखूब खूब आशीर्वाद ।
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